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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

"कंधमाल के बहाने से " [ क्र० - II }

"कंधमाल के बहाने से"-II


मैं अभी भी नही जानता कि कंधमाल उडीसा के किस हिस्से में है |बैठे ठाले13 अक्टोबर 2008 दिन सोमवार के दैनिकजागरण समाचार पत्र का सम्पादकीय पृष्ट हाथ लग गया,खोलने परदो लोग दिखे |पहले कोई इतिहास के परोफेसर श्री विश्वमय पति दिखे बड़ा सा बैनर " हिन्दू नही है उडीसा के आदिवासी " लगा था ,पहले तो लगा कि ज्ञान चक्षु खोलक इस ब्रांड नाम का किसी अंजन का प्रचार -प्रसार किया जा रहा है ,कुछ ऐसा था भी और नही भी था ,अंजन की बिक्री ना हो कर अपनी विचार धारा के द्वारा वे भारतवासियों के ज्ञानचक्षु ही खोलना चाहते थे |श्रीविश्वमय जी अपनी विशेष कक्षा लगाए हुए थे जिसकाविचार बिन्दु ही उस बैनर पर लिखा था |दूसरे दिखे अपन के जाने पहचाने श्री स्वपनदासगुप्ता ,उन्हों ने भी कंधमाल का टिकट कटा रखा था |

जहाँ तक मुझे याद आता है जब मैं बच्चा था उस समय हमारे शहर से देश की राजधानी या देश के दिल यानी कि 'दिल्ली ' जाने के लिए ट्रेन के दो रूट हुआ करते थे ; एक वाया सहारनपुर और दूसरा मुरादाबाद हो कर , जहाँ ट्रेन बदलनी पड़ती थीं ; एक ट्रेन नई -दिल्ली या सच कहूं तो न्यू -डेल्ही तो दूसरी पुरानी दिल्ली पहुंचाती थी इस विवरण का उद्देश्य मात्र आप को यह बताना है कि उसी प्रकार भारतीय इतिहास के अध्ययन के दो माध्यम है,पहला माध्यंम भारतीय वांग्मय हमारे पुराण ,प्राचीन कहावतें- किवदंतियां तथा हमारी वे पारंपरिक कथाएं जो दादी नानीयाँ हमें हमारे बचपन में सुनाया करती थीं ; और
इसी के द्वारा ,इन कथाओं में छिपे हमारे इतिहास का अगली पीढी को पता लगता
वह हमें हस्तांतरित भी हो जाता तथा अगली पीढी को संस्कारित कराने का कार्य
भी यही कथाएं हीं करती थी , इनमें अधिकांशतः अलिखित हीं हुआ करतीं थीं
,इन्हे भी 'श्रुतियां ' पुकारें तो अनुचित नही होगा | यह तो हुई पुरानी
दिल्ली स्टेशन पहुचने वाली ट्रेन की बात |

अब
बात करतें हैं नई दिल्ली या न्यू डेल्ही स्टेशन पहुँच ने की बात , यह तो
प्रतीक मात्र है ,इसबात पर जोर देने के लिए कि भारतीय इतिहास को पढ़ने एवं
जानने की दूसरी राह मैक्समूलर के द्वारा दिया ब्रह्म ज्ञान ;कुछ लोगों को
भारतीय इतिहास का वही अन्तिम सच लगता है || जब हम यहीं पैदा होकर पूरे
जीवन भर अपनी रस्मों परम्पराओं को देखते सुनते और निभाते रह कर भी उनके
पीछे छिपे भावार्थ को , कारणों को , उदेश्यों को रहस्यों को जान और समझ
नही पाते जब कि वे हमारी रोजमर्रा ज़िन्दगी से जुड़ी होतीं है | तो फ़िर
भिन्न संस्कृति एवं परम्पराओं के पराये देश से आया , कुछ समय से इन सब के
संपर्क में रहा व्यक्ति इनका विशेषज्ञ कैसे हो सकता है ?

जब कम्युनिस्ट कहतें है ' धर्म समाज कि अफीम है ' तो समझ में आता है ,परन्तु जब वे द्वैताद्वैत कि विवेचना कर के उसका रहस्य हमें समझाने का प्रयत्न करें तो भाई मेरी समझ में तो नही आता |

आप की समझ में आता हो ,तो मेरी समझदारी बढ़ाने की अनुकम्पा अवश्य कीजिएगा |

खैर इस सिलसिले को आगे बढाते हुए कोई मुझे बताएगा की श्री विश्वमय पति जी
द्वारा उल्लिखित ये " , " क्या या कौन हैं ;ये चर-अचर ; जीव निर्जीव
क्या हैं , यह शब्द बहुत दिनों से विभिन्न सन्दर्भों में सुनता चला आरहा
हूँ | मैंने पाया कि जो भी इसके संपर्क में आता है , इसको गाली दे कर एवं
इसे अगर " लतिया - जुतिया " ना पाया तो तो मौका पाकर " चपतिया " तो जरूर
से जरूर देता है और खूब खुश होलेता है || हाँ यदि श्री विश्वमय पति जी स्वयं इसे
समझा सकें तो उनकी महान कृपा होगी !!!


श्री विश्वमय पति जी को साधुवाद उनका इस सिलसिले में आभारी रहूँगा कि उनके
द्वारा मेरा ज्ञान वर्धन हुआ कि यह तथा कथित हिन्दू चौर्य कर्म भी जानते
हैं ,और छोटी-मोटी चीजें ना चुरा कर दूसरों के भगवान ; देवी देवता चुराते
हैं ,अखिरकार उन्हों ने आदिवासियों के देवी देवता और भगवान जो चुरा लिए
हैं |

मैं आज तक यह नही समझ पाया हूँ कि अखिर ऐसा क्यूँ कर है कि हर आधुनिक
मूर्यधन विद्वान यही सिद्ध करने में लगा हुआ है कि भारत वर्षे नामक इसदेश
के बहु संख्यक निवासी इस देश के मूल निवासी नही हैं ;परन्तु ऐसा कहने वाला
विद्वान यह भी बता कर नही देता कि ' वे ' मूलतः कहाँ के निवासी थे , यहाँ
बाहर से आये तो कहाँ से आये और जहाँ से आये तो क्या वहाँ पर उनके
पुरातात्विक अवशेष उपलब्ध हैं यदि नही तो क्यों नही ?और यदि पूरे विश्व
में इनके उत्पति एवं अस्तित्व के प्रमाण कहीं नही मिलते ,तो क्या यह
'आसमान से ' टपके " हैं ?!?---------लोगों को याद होगा कि कुछ वर्षों पहले किसी विदेशी लेखक की एक पुस्तक का हिन्दी अनुवाद शायद ,'क्या देवता पृथ्वी पर आए थे 'शीर्षक के साथ आया था कहीं यह तथा-कथित हिंदू उन्ही देवताओं कि संतान तो नही थे , क्योंकि तथा कथित हिन्दुओं की भाषा हिन्दी -हिन्दुस्तानी में एक कहावत बहुत मशहूर है '................ख़ुद तो चले गए औलाद छोड़ गए ' अथवा '. 'ख़ुद तो मर गए औलाद छोड़ गए ' पीछे हटते -हटते इन हिन्दुओं कि उत्पति देवताओं के ही समरूप " आर्य "नामक प्रजाति से हुयी लगती है ;क्यों कि मेरे द्वारा देखे -सुने और मुझे समझाये गए तथाकथित हिंदुत्व का जन्म वैदिक परम्परा से हुआ है या था ,ऐसा मुझे बताया गया है | वैदिक परम्परा के ध्वजा वाहक आर्य प्रजाति को माना क्या ,स्वीकार किया जाता है | आर्य का एक भावार्थ 'श्रेष्ठ ' भी कहा जाता है , ऐसा होना -कहना तार्किक रूप से सही भी होगा ,क्यों कि अज्ञात गहन अन्तरिक्ष से आए आगंतुक देवताओं के, अपने से रूप-रंग में :: ज्ञान आदि में श्रेष्ठ पाए गए उन प्रतिनिधियों को पृथ्वी के मूल निवासियों अपनी भाषा में श्रेष्ठ यानी कि आर्य पुकारा "आर्य " नाम दिया , और अगर एक प्रतिशत भी ऐसा है तो स्पष्ट है कि "आर्य " शब्द देव-वाणी या देव भाषा का शब्द तो नही ही हो सकता | उसके बाद तो लोग [स्थानिक ,पृथ्वी वासी ] आते और तथाकथित हिन्दू और हिदुत्व का कारवां चल पडा चल पडा और आज भी चाहे अपने बिगडे रूप में ही सही बेशर्मी के साथ चला ही जारहा है : चला ही जारहा है |
इन बातों के बाद भी श्री विश्वमय पति जी प्रोफेसर साहब जैसे महान काल दृष्टा [ [ पुराने काल के : सतः युग अगर ऐसा कोई युग था भी : के मंत्र -दृष्टा ऋषियों के के सामान ] ] सभी विद्वानों से मेरा प्रश्न यथावत यक्ष -प्रश्न के रूप में उत्तर प्राप्ति की आशा-दुर्षा केरूप में जीवित है ,जीवित रहेगा ||
इसी बहाने के निशाने अभी और भी हो सकते हैं परन्तु पहले पहला निशाना
चिट्ठा::अन्योनास्ति
कालचक्र की
चौपाल के
झरोखा से
कबीरा

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क्या कहें हम जिंदगी का फ़साना,: कभी ज़माने ने साथ न दिया ,: तो कभी ज़माने के साथ न चल सके,: बाकि है अभी बहुत कुछ सुनना :.......... ......................................... B.Sc.,Retire{d}on 31/12/2008,Unmarrid,

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